अनुज अग्रवाल
राष्ट्रीय

जलवायु परिवर्तन व ऊर्जा संकट हैं रुस-यूक्रेन विवाद के पीछे – अनुज अग्रवाल

जिस किसी को यह ग़लतफ़हमी है कि रुस और यूक्रेन का युद्ध टल चुका है वे निश्चित रूप से ग़लत हैं। शेयर बाज़ार के उतार चढ़ाव के भरोसे कूटनीतिक खेलों का आँकलन करना छोड़ दें। युद्ध न होने मगर सीमाओं पर सेनाओं के डटे रहने के नुक़सान भी युद्ध जैसे ही होते हैं। गोलबारी व बमबारी में तो मात्र युद्धरत दो देशों को ही जान माल का नुक़सान होता किंतु पूरी दुनिया पर जो महंगाई का बम गिरता है वो युद्ध के होने के बाद ही नहीं वरन युद्ध जैसे हालात में भी फूटता रहता है। इसी कारण दुनिया में तेल व गैस उत्पादक देशों की चाँदी हो रही है व बाक़ी देश बुरी तरह पिस रहे हैं। रुस और यूक्रेन के बीच बिगड़ते हालातों के पीछे नाटो देश विशेषकर अमेरिका है जो लगातार पिछले लंबे समय से यूक्रेन पर डोरे डाल रहा है। किंतु रुस की आक्रामकता के आगे उसे बार बार मुँह की खानी पड़ रही है।किंतु इसके बाबजूद आर्थिक लाभ दोनो को ही प्रचुर मात्रा में हो रहा है।इसलिए यह एक प्रकार की नूरा कुश्ती भी कही जा सकती।

बदलती दुनिया और परिस्थितियों ने अमेरिका को कमजोर किया है और रुस व चीन अब बराबर के स्तर पर व्यवहार चाहते हैं। यही बात अमेरिका को अखर रही है । वह बार बार यह भूल जाता है कि उसकी स्थिति कमजोर हो रही है व रुस व चीन मज़बूत होते जा रहे हैं। इसी कारण नाटो देशों में भी दो फाड़ की स्थिति है। फ़्रांस, टर्की, जर्मनी व इटली के रुस व चीन से बढ़ते संबंध एक नई विश्व व्यवस्था उभरने के संकेत दे रहे हैं। जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा संकट ने पूरी दुनिया के कूटनीतिक , आर्थिक व सामरिक संबंधो को उलट-पलट कर रख दिया है। यूरोप के कई देश जलवायु संकट के कारण उत्पन्न स्थितियों में गैस का खनन नहीं कर पा रहे हैं और लंबे शीत काल के कारण उनको पूरे वर्ष अपने घर, कार्यालयों व परिसरों को गर्म रखने के लिए प्रचुर मात्रा में गैस की आवश्यकता पड़ती है। निकट का देश होने के कारण रुस से यह गैस मंगाना सरल व सस्ता पड़ता है।

यूरोपीय देशों को जितनी प्राकृतिक गैस की जरूरत पड़ती है, रूस उन्हें उसका एक तिहाई हिस्सा सप्लाई करता है।लेकिन अप्रैल 2021 के बाद उसने सप्लाई में बड़ी कटौती की है। ऐसा जानबूझकर गैस का दाम बढ़ाने व ज़्यादा कमाई करने के लिए किया गया। इस कारण यूरोप में गैस के दाम पाँच गुना तक बढ़ गए हैं। यूक्रेन में चूँकि गैस के प्रचुर भंडार हैं इसलिए यूरोप के नाटो देश उसको अपने गुट में शामिल करने के लिए तरह तरह के लालच दे रहे हैं। रुस को लगता है कि यूक्रेन को नाटो का सदस्य बनाने के बहाने नाटो देश उसको चारों ओर से घेर सकते हैं। इसी कारण वह यूक्रेन का नाटो का सदस्य बनने का विरोध कर रहा है।

रणनीतिक रूप से रुस और अमेरिका गुप्त अभियान पर काम कर रहे हैं। अमेरिका चाहता है कि रुस यूक्रेन पर हमला कर दे और इस बहाने वो रुस को युद्ध में उलझाकर आर्थिक प्रतिबंध थोप देगा और यूरोप को गैस की आपूर्ति का काम हथिया लेगा और मोटी कमाई कर पाएगा। वहीं रुस यूक्रेन के दो टुकड़े करना चाहता है या फिर उसमें अपनी कठपुतली सरकार बैठाना चाहता है। ऐसा करने से यूक्रेन के गैस भंडार रुस के क़ब्ज़े में आ जाएँगे और रुस यूरोप को ज़्यादा गैस बेचकर अधिक माल कमा पाएगा। किंतु इन दोनो ही कार्यों को करने में सीमित युद्ध व दबाव आवश्यक है। परोक्ष रूप से रुस के इस खेल को चीन का पूर्ण समर्थन है और जर्मनी भी चूँकि पूरी तरह गैस की आपूर्ति के लिए रुस पर ही निर्भर है इसलिए रुस के पाले से बाहर नहीं जाएगा।

इन परिस्थितियों में इस क्षेत्र में अब लंबे समय तक झड़प, सीमित युद्ध , बड़े युद्ध और विश्व युद्ध तक किसी भी तरह की संभावना बनी रहेगी और तेल व गैस के दाम ऊँचे बने रहेंगे। आगे आगे जैसे जैसे जलवायु परिवर्तन और भयावह रूप में सामने आएगा वैसे वैसे संघर्ष की स्थितियाँ और विकट होती जाएँगी। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि तीसरा विश्व युद्ध ( अमेरिका चीन व्यापार युद्ध) जो कोरोना महामारी की आड़ में जैविक युद्ध का स्वरूप लिए हुए था अब जल्द हथियारों की लड़ाई के रूप में सामने आने वाला है।

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चूँकि महाशक्तियों को व्यापारिक व आर्थिक हित साधने की चिंता अधिक रहती है इसलिए वे आपस में सीधे नहीं टकराएँगी और परमाणु युद्ध की सम्भावनाएँ भी न के बराबर हैं किंतु झपटमारी के खेल में छोटे मोटे युद्ध और खूनी संघर्ष होने तो तय हैं। अगर आगे वैश्विक जलवायु परिवर्तन की स्थितियाँ तेजी से बिगड़ती हैं तो आमने सामने के युद्ध से भी इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि तब दुनिया की जनसंख्या, जीवाश्म ईंधनों व भोतिक संसाधनों को उपयोग तेज़ी से कम करना होगा और हरित ऊर्जा व इलेक्ट्रिकल वाहनो की और तेज़ी से बढ़ना होगा।

ग्रीन एनर्जी चूँकि बहुत ज़्यादा सस्ती है इसलिए इसका प्रयोग बढ़ते जाने से तेल गैस उत्पादक व वितरक देशों की अर्थव्यवस्थायें व जीडीपी अत्यधिक सिकुड़ती जाएँगी और इस कारण दुनिया में दर्जनों देशों में भीषण आंतरिक व अंतरराष्ट्रीय संघर्ष होना तय है। और यह बस अगले कुछ वर्षों में होने जा रहा है।क्या हम तैयार हैं इसके लिए?

अनुज अग्रवाल
संपादक, डायलॉग इंडिया
www.dialogueindia.in

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