डायन प्रथा की आड़ में महिलाओं पर अत्याचार
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डायन प्रथा की आड़ में महिलाओं पर अत्याचार

डायन प्रथा की आड़ में महिलाओं पर अत्याचार आज भी ऐसे जारी है जैसे हम प्राचीन काल में जी रहे हैं।हमारे देश क्रो आजाद हुए लगभग 70 बर्ष होने को हैं और हम 21वों सदी मेँ जी रहे हैं। देश के अनेकों सर्वोच्च पदों पर महिलाएं सुशोभित कर रही हैं क्ति महिलाओँ पर अत्याचार बालों कुप्रथाएं बदस्तूर जारो हैं। देश चाहे कितनी भी तरवक्री कर रहा हो लेकिन कुछ गलत हरकतें इसकी शान में बट्टा लगा देती हैं। उत्तर भारत क कईं राज्यों मेँ ‘ डायन प्रथा’ के जरिए महिलाओँ पर लोमहर्षक अत्याचार होते रहे हैं।

औरतों की ज़मीन और संपत्ति हड़पने के मकसद से, आपसी द्वेष और यौन संबंध स्थापित करने से मना करने के कारण पडोसी और रिश्तेदार उन्हें डायन घोषित करने का षहयंत्र रचते हैं। आदिवासी गांवों मेँ जहां अंधविश्वास बड़े पैमाने पर है और इलाज की सुविधाएं बुरी हालत मेँ हैं, नीम हकीम के भरोस हैं वहां ये लोग स्थानीय लोगों के साथ मिलकर फ़सल बर्बाद होने, बीमारो और प्राकृतिक आपदाओं क लिए औरतों को जिम्पबार ठहराने का षहयंत्र रचते है। कईं पिछड़े इलाकों में चुडैल आदि के आरोप लगाकर महिलाओँ को सार्वजनिक रूप से सजा देने की प्रथाएँ विद्यमान हैं। इसे भिन्न भिन्न स्थानों में भित्र भिन्न नामों से जाना जाता है यथा चुडैल, डायन, डाकिनी, डाकण आदि।

राजस्थान आदि में इसे डाकण प्रथा नाम से भी जाना जाता है। यह एक कुप्रथा है, जिसमेँ माना जाता है क्री जो महीला मन्त्र विद्या जानती है जो छोटे बच्चों एबं नवविवाहित वधुओं को रबा जाती है। बिशेष रुप से यह प्रथा आदिवासियों में पाई जाती है, सबसे पहले इस प्रथा की जानकारी राजस्थान के उदयपुर जिले में खेस्वाडा क्षेत्र

से अग्रेजों को मिली थी। डायन प्रथा बिहार के कई इलाकों मे आज भी सक्रिय है इसमे जादू के नाम पर औरते। को बलि दो जाती है। राष्टीय महिला आयोग कौ हाल की रिपोर्ट के अनुसार झारखण्ड, असम, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, बिहार, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट के 5० से अधिक जिलों में महिलाओँ को डायन बता कर उन पर अत्याचार किए जाते हैं। मीडिया के कारण ( भले ये उनके लिए महज टी. आर. पी. या सकुंलेशन बढने का तमाशा मात्र हो) कुछ घटनाये तो सामने आ जाती हैं पर कई ऐसी कहानियां दबकर रह जाती होंगी। बेशक ये बातें आपके-हमारे बिलकुल करीब की नहीं, गांव-कस्यों की हैँ।

किसी खास समुदाय या वर्म की हैं, पर सिर्फ इससे, आपकी-हमारो जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती। लेकिन ये महज़ खबरे नहीं, जिन्हें एक नज़र देखकर आप निकल जाते हैं। इनमें एक स्वी की ‘चीख’ है, उसका ‘रुदन’ है, उसकी ‘ अस्मिता’ के तार-तार किये जाने की कहानी है, अन्थविश्वास का भंवर जिसका सब कुछ डुबो देता है और हमारा ‘सभ्य’ समाज इसे ‘डायन’ कहकर खुश हो लेता है। ‘डायन’ , क्या इसे महज अन्थबिश्वास, सामाजिक कुरीति मान लिया जाये या औरतों क्रो प्रताडित किये जाने का एक और तरीका। आखिर डायन किसी स्वी को ही क्यूं कहा जाता है? क्यूंकूएं के पानी

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के सूख जाने तबीयत खराब होने या मृत्यु का सोधा आरोप उसपर ही मढ दिया जाता है? असल में औरतें अत्यंत सहज, सुलभ शिकार होती हैं क्यूंकि या तो बो विधवा, एकल, परित्यक्ता गरीब, बीमार उम्रदराज होती हैँ या पिछड़े वर्ग, आदिवासी या दलित समुदाय से आती हैं, जिनकी ज़मीन, जायदाद आसानी से हड़पी जा सकती है. ये औरतें मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से इतनी कमजोर होतो हैं कि अपने ऊपर होने चाले अत्याचार की शिकायत मी नहीं कर मार्ती.

पुलिस भी अधिकतर मामलों में मामूली धारा लगाकर खानापूर्ति कर लेती है। काला जादू मा टोना…र्टाटका के अंधविश्वास भरे आरोप लगा कर किसी महिला को डायन बताकर मार डाला जाता है। गौरतलब है कि यह कुप्रथा सिर्फ महिलाओं पर अत्याचार करने के लिए ही बनी है। आज तक किसी पुरूष की पिशाच, राक्षस, जित्र या मूत कहकर हत्या नहीं की गई है बल्कि उनका महिमामंडन ही किया जाता रहा है। संयुक्त राष्ट संघ की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में 1987 से लेकर 2 ००3 तक, 2 हजार 556 महिलाओं के हत्या की गई थी।

डायन प्रथा की आड़ में कई संगीन अपराधों क्रो अंजाम देना हमारे समाज में आम बात है। मारत के गांवों में आज मी अंधबिश्वास और रूढिवादिता “नाग की भांति फन फैलाए बैठा है। गावो तथा छोटे कस्बे मे अभी भी सक्ति, ओझा, पैया, गुनिया लोग अपने मतलब के लिए किसी महिला को कथित तौर पर डायन, डाकनी, टोनही आदि घोषित कर देते है। वहीं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का मनोरंजन पाखण्ड बे रोक टोक दिखाए जाते हैं।

टी बी सीरियलों में भूत, प्रेत, डायन, शक्तिशाली नवरत्न, चमत्कारों, अंधविश्वास और पाखंड को चमक दमक के साथ निर्बाध प्रचारित किया जा रहा है। इसके लिए कोई कानून नहीं है। महिला आयोग का कहना है कि अक्सरमहिलऔंकौसंपति से बेदखल करने, ऊब्रकौ संपति पर कब्जा करने, यौन शोषण का विरोध करने १। पर्ल को तलाक देने के लिए इस ‘अथ का इस्तेमाल’ किया जाता है।

आयोग ने राजस्थान के टोंक जिले की कमला नामक एक महिला का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे कमला के पी ने उसे ‘डायन’ धोषित करवा दूमरी महिला से शादी कर ली तथ उसे बुरे हाल में धर तथ गांव से निकाल दिया। गुजरात के वडोदरा, पंचमहल और दाहोद जिले डायन वताका हत्य करने के लिए कुंख्यतरहेहै। कईमामलें में पूस गांव ही हत्या में शाक्ति माय गया है।

आखिर कब तक पुरूष प्रधान समाज ओरतों के पैरों में अत्याचार की बेड़ियाँ डाल कर रखेंगे। इसपर जरूर संवैधानिक पद पर बैठे उच्चाधिकारियों को अमल करना चाहिए।

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